Tuesday, April 24, 2018

मौन-व्रत



कहीं दूर तक
जहाँ तक
नज़र जाएगी
तकते रहेंगे
लोकातीत
तुम्हारे आकाश को हम
चंद लम्हों की सौगात लेकर

फिर मिले, हम
न मिले
यादें विचरती रहेंगी -
कहीं दूर तलक
लुग्दियों से भरी
जमी हुई आकाश में

तुम्हारे शब्दों का
अस्तित्व ख़त्म होगा जब
एक पूर्ण आकाश -
अस्थिविहीन ठठरी को
सजायेँगे हम
तुम्हारी वीरानगी का


मौन व्रत लिए

Saturday, April 21, 2018

भाव विहीन सा


हल्के कदम से
कोई आता है
स्वर्णीम् पल का
आगाज लिए
दिशा दोष को मिटाता -
विलुप्त होते 'मैं ' को
एक नई जगह
का भान कराता
कोई है
कोई है जो
बीज बोता, यहाँ
निवृत्त भाव लिए
पंखों का संसार लिए
पंख फैलाता
टीमटीमाते आँखों का;
अर्पित, आपरं अपार लिए
अभी वक़्त है
निर्लज जग हंसाई का
फिर कौन मरता है, यहाँ
अमृत्व भाव लिए
हल्के कदम से
कोई अाता है , और
फूर्र उड़ जाता है, करके
भाव विहीन सा

Sunday, April 15, 2018

आसिफा तुम्ही हो न ...



घटक श्मशान पर
वाज़िब है
परे रहेंगे
लाशों के ढ़ेर
और
जलती रहेगी चिता, अट्टहास -
झिलमिलाते पानी में

दफ़न है
दफ़न है,
बेमानी सी जिन्दगी
यहाँ
अमावस पहर लिए

क्यों पनाह
देते नहीं तुम.
अविरल हो -
ऐसे दिखते क्यों नहीं

मैंने अपने पर
गुजरते
कभी दर्द पाया नहीं
आदमी हूँ न -
अस्मिता लूट जाने
की चीख़ कभी सुनी नहीं

बेटियों का बाप हूँ न
ऐसा लगता है की
कमी सी रह गई है मुझमें

फिज़ा में शोर है.
सुनाई देता क्यों नहीं
लहू टपकते क्यों नहीं
जमी हुई आँखों से

आशिफ़ा तुम्ही हो
तुम्ही हो न ...


मेरी बेटी सी

Tuesday, April 10, 2018

सभी चले जायेंगे



सभी चले जायेंगे
हम भी चले जायेंगे

एक धुन  -
जगत में
प्यासी सी रह जाएगी

कभी खेत - खलियानो में - देख
अँकुरित बीजों को
मुस्कुरायेंगे हम
और, फिर
आँखों में बारिस लिए
बरस जायेंगे

शब्दों की सैय्या पर
बधिर और मूक होकर
टटोलेंगे तुम्हे हम
खुले आसमान का
आस - विश्वास लिए

जब फ़सल -
काट कर
बाज़ार में बेचा जायेगा
तो हम खाली परे खेतों पर
फिर एक बार
अपनी नज़र दौड़ायेंगे
और सपनों का सब्ज़ लिए
बरस जायेंगे

सभी चले जायेंगे
हम भी चले जायेंगे

एक धुन  -
जगत में
प्यासी सी ..

सब्ज़  = green pasture

RUSTLE YOUR FREEDOM

Why mumble and fret your loneliness, here by the pulse of your weaker heart gnawing days and night afflicting you with scars and multiple woes Expand the reach out of your thoughtful thought plunging deeper than the deep, Where the splashing Wear a sound of silence Liberating your senses of its will Rustle your freedom Unshackling your self, unblemished from the trees of vice and ignorance Where no season can hiss you now by its fangs of reason and debt Stay, where the height grips you there

IN YOUR SHADOW

Your silence have
kept me - eons;
cocooned inside thousand books
stacked one after the other
Yet I find you
in every crooning of my heart
May I look so fragile,
crumpled and pale
pages after pages
Yet, wherever
familiarity wafts into the air;
In no lesser whiffs
I finds you enchanting
closest to my
heaving heart
bewildering me
by your presence -
a fresh draught; that
lees me priceless
in your shadow

Saturday, April 7, 2018

कतबा



अब और किस सफर को
मुक़ाम दू
तेरे मुन्तज़र
सारा खला खाली कर दिया दिया

तेरी क़ुरबत ने
ऐसा तअस्सुर बाँधा, की
मेरी हरेक ज़ुस्तज़ु
ज़र्रे ज़र्रे पर लर्ज़ है

खामियाज़ा, मुझे
जिन्दा रह कर लड़ना पड़ा
वरना
हरेक कतबा मेरे नाम से दर्ज़ है

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maqam = place
muntazar = Awaiting
zustazu = Quest
qurbat = closeness
zarra = atom
furqat = seperation
taassur = effect


katba = Epitaph