Wednesday, October 25, 2017

जनून



टहनियों के रसुक से
दरख्त भी  हरे  भरे लगते  हैं 
फिर  पतझर का यह कुहापन 
जमीं पर क्यों नज़र अाता  है 

माना की मौसम का मिजाज
शुस्क  है बजरने के लिए
फिर  ये  लमहा क्यूँ  है 
आफताब लिए हुये

कभी हम भी थे हुनरमन्द
लब्जों का  तलब लिए  हुये
फिर ये गमजदा क्युँ  है 
पूरा आसमां  लिए  हुये 

माना की आह  की लपट
दिल को आग  लगाती  है
फिर  क्युँ  जर्रे जर्रे पर 
एबादत का  जनून  शर्द है

Thursday, October 19, 2017

क्या रौशन करूँ



माँ! क्या रौशन करूँ?
रुद्ध कण्ठ का तिमिर रास
निर्गन्ध उपवन फास
किसे उज्जवल करूँ

सजल अजल अश्रु धार
विशाल समुन्द्र, अधीर समीर
प्रमाद भरा जीर्ण-क्षीण
तरणि पार कैसे लाऊँ ?

माँ! क्या रौशन करूँ?
वह रूप कहाँ से लाऊँ
फलक पर तुण्ड है
काले बादलों का झुण्ड

शिथिल सा शील पग
चरणों में कैसे लाऊँ
किसे बुलाऊँ
माँ! क्या रौशन करूँ?

Wednesday, October 18, 2017

LIGO



In what nobel gesture
you prize a catch
the invisible ripples of
colliding stars
down
on the curvature of space and time; as
you cross the space
between us, weak
of gravitational waves
interfering inside
four kilometer long arms, mirroring
the depth
of your presence -
'cosmic gravitational waves'
A long story rippled
inside the observatory
after hundred years gap

SWEET UNREST

Your sweet unrest -
the fluffy void
of the sweetest kind, above;
never fails me
in your temporal adieu, as
You were here only
a while ago
body and flesh
when fate
descanted me of your whereabouts

OUTCRY



Outcry of the
haunted soul
ditch a howl
into dark pitched nights -
tormented tombs reverberates

and

flits secretely
through the bower
of an eternal grave
twisting dark air -
felching and pelping

and

wriggling no more fear
or the fright
that hawked on me previously
I swallowed poison -
gurgling down the throat


and

with an unbeliever's eyes
ensnared long ago
storm the vortex
into an eternal light -
utter relief transcends

बयार

आसमां तर है
नफ़स-ए-सर्द में, कि
एक बयार सी चली है
मंद मंद भाव लिए हुए
ख़ुमारी ऐसी की
ना रंगों - रंध की चाहत है
ना किसी से शिकवा शिकायत
एक नब्ज़ रब्ध है
सहर होने तलक

P.S.-
नफ़स-ए-सर्द = cold breath
रब्ध = start
सहर = sunrise

COOL BREATH

whole sky is
breathing cold
breezing thoughtful soft
as moments hangover
the cursory sight
away from hues and heights
harbouring no ill to anybody
but a craving heart
till the daybreak

Sunday, October 15, 2017

वक़्त



कल की ही बात थी
अब ये ज़माना कैसे गुज़र गया,
अभी अभी तो सुबह थी
अब पहर ये कैसे ढल गई

अजीब दास्तां है
रूहानी अल्फाज की,
दिल ए लब्ज के मयाने
हजार लहरों से उफनती है

दर्दे बयां क्या करू
सौ चुभन भेदे है ज़ीस्त को
कल ही तो मिले थे यहाँ
अब वक़्त ये कैसे  गुज़र गया